नागपाल साहब की मौत के बाद उनकी मिलकियत कम्पनी के शेयर, उनकी दो बेटियों में बंट गए तो उनको कब्जाने के लिये लोगों में जैसे होड़ लग गयी । एक प्रतिद्वंद्वी तो शेयरों के साथ-साथ उनकी एक मालकिन को भी कब्जाने के सपने देखता था
आॅफिस में लाश (सुनील 80)
✍ Scribed by पाठक, सुरेन्द्र_मोहन
- Book ID
- 110576363
- Year
- 1980
- Tongue
- Hindi
- Weight
- 82 KB
- Series
- सुनील #८०
- Category
- Fiction
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✦ Synopsis
एक तेज भागती कार जब एक पद से जा टकराई तो ड्राइवर का तो बाल भी ना बांका हुआ लेकिन उसकी बगल में बैठे आदमी ने वहीं दम तोड़ दिया ! एक रहस्यपूर्ण एक्सीडैंट की रोमांचक दास्तान ।
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सुनील का मिशन एक चीनी एजेंट से जानकारी हासिल करना था । लेकिन जब निश्चित समय के काफी बाद तक भी सुनील उससे ना मिल पाया तो वो समझ गया कि दुश्मन चाल चल गया था और अब उसका मिशन और जीवन दोनों खतरे में थे !
एक साधारण चोरी की वारदात के तार एक कत्ल से ऐसे जुड़े कि कीर्ति के हवास खो गए । जब उसके अपने परिवार ने भी उस पर विश्वास ना किया तो उसे सुनील सिर्फ का ही आसरा था ।
कांसे की बनी हुई, एक हजार साल पुरानी नटराज की एक प्रतिमा चोरी चली गई । और साथ-साथ ही चोरी चले गये थे देश के एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान से सम्बंधित रहस्य । और अब सुनील का डबल मिशन था दोनों चीजों को ढूंढ निकालना ।
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एक लेबर यूनियन लीडर की बेटी की एक सिंगर के लिए दीवानगी से उपजी रहस्यपूर्ण कहानी जिसमें सुनील की टांग न फंसी होती तो शायद क़त्ल न होता !